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Showing posts from December, 2024

An Inspirational Story :-"Stand Up" (एक प्रेरणादायक कहानी :- "ऊपर उठो")

"ऊपर उठो" - एक प्रेरणादायक कहानी छोटे से गांव के बीचों-बीच एक पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ के नीचे बैठा 14 साल का अंशु, स्कूल की किताबें हाथ में लिए गहरी सोच में डूबा था। वह अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता था, पर उसके सपनों और उसकी स्थिति के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी थी। अंशु का परिवार गरीब था। उसके पिता किसान थे और मां घर पर सिलाई का काम करती थी। पढ़ाई के लिए अंशु को रोजाना 5 किलोमीटर चलकर स्कूल जाना पड़ता था। रास्ता कठिन था, लेकिन उसकी लगन उसे कभी पीछे हटने नहीं देती थी। एक दिन स्कूल में मास्टर जी ने कक्षा में एक सवाल पूछा, "आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं?" अंशु ने बिना झिझक कहा, "मैं वैज्ञानिक बनना चाहता हूं।" सारी कक्षा ठहाका लगाकर हंस पड़ी। किसी ने कहा, "अरे, तुम तो खेत जोतने लायक भी नहीं हो। वैज्ञानिक कैसे बनोगे?" मास्टर जी ने भी उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उस दिन अंशु का मन बहुत उदास था। वह घर लौटते वक्त बार-बार सोचता रहा, "क्या मैं सच में कुछ नहीं कर सकता? क्या मेरी गरीबी मेरे सपनों का अंत है?" मां की प्रेरणा

प्रेरणा की ज्योत : "शिक्षक का अद्वितीय उपहार"

"शिक्षक का अद्वितीय उपहार" एक छोटे से गांव में, जहां तक बिजली के तार भी नहीं पहुंचे थे, वहां के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक रहते थे, जिनका नाम रामशरण था। रामशरण जी के पास बहुत अधिक साधन नहीं थे, लेकिन उनके पास बच्चों को सिखाने का जुनून और उनकी जिंदगी बदलने की चाहत जरूर थी। उनके लिए शिक्षा केवल अक्षरों और अंकों तक सीमित नहीं थी; वह इसे जीवन को बेहतर बनाने का साधन मानते थे। गांव का सबसे कमजोर छात्र रामशरण जी के स्कूल में एक बच्चा था, जिसका नाम मोहन था। मोहन पढ़ाई में बहुत कमजोर था। वह अक्सर पाठ याद करने में असफल रहता और बाकी बच्चों के बीच मजाक का पात्र बन जाता। उसकी स्थिति ऐसी थी कि हर शिक्षक उसे अपने सिर का दर्द मानता। मोहन के माता-पिता किसान थे, और वह स्कूल के बाद खेतों में उनकी मदद करता था। दिनभर की थकान के बाद वह पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाता था। उसकी आत्मविश्वासहीनता इतनी बढ़ गई थी कि उसने खुद को नाकाम मान लिया था।

"बचपन का साथी" (दिल को छू लेने वाली कहानी)

"बचपन का साथी" यह कहानी एक छोटे से कस्बे के दो दोस्तों, राहुल और कबीर, की है। दोनों बचपन से ही एक-दूसरे के साथ बड़े हुए थे। उनकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि लोग उन्हें एक आत्मा और दो शरीर कहते थे। दोनों का सपना था कि वे बड़े होकर कुछ ऐसा करें जिससे उनके परिवार और कस्बे का नाम रोशन हो। राहुल एक गरीब परिवार से था। उसके पिता किसान थे और बड़ी मुश्किल से परिवार का गुजारा चलाते थे। दूसरी ओर, कबीर एक अमीर व्यापारी का बेटा था। हालांकि उनके हालात अलग थे, लेकिन उनकी दोस्ती पर इसका कभी असर नहीं पड़ा। बचपन की यादें दोनों स्कूल जाते समय एक ही साइकिल पर बैठते। कबीर की नई साइकिल थी, लेकिन वह राहुल को भी अपने साथ बैठा लेता। जब राहुल के पास स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं होते, तो कबीर अपने पिताजी से कहकर उसका इंतजाम कर देता। कबीर के लिए यह छोटी बात थी, लेकिन राहुल इसे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा उपकार मानता था।

"असंभव कुछ भी नहीं" (प्रेरणादायक कहानी)

"असंभव कुछ भी नहीं" यह कहानी है एक छोटे से गाँव के लड़के अर्जुन की, जिसने अपनी मेहनत और दृढ़ निश्चय से यह साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। अर्जुन के पिता एक छोटे किसान थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। गाँव में शुरुआत अर्जुन का सपना था कि वह बड़ा आदमी बने और अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकाले। लेकिन गाँव में शिक्षा के साधन बहुत सीमित थे। अर्जुन सुबह-सुबह अपने पिता के साथ खेतों में काम करता और दिन के समय गाँव के स्कूल में पढ़ाई करता। वह अक्सर स्कूल में सबसे आगे रहता, लेकिन एक समस्या थी। स्कूल में किताबें और संसाधन कम थे। अर्जुन ने किताबों के लिए गाँव के मुखिया से मदद मांगी, लेकिन उन्होंने उसकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया।

बच्चों की ख़ुशी ( एक प्रेरणादायक कहानी )

बच्चों की ख़ुशी   एक प्रेरणादायक कहानी गाँव का स्कूल एक छोटे से गाँव में, जहाँ हरियाली और सादगी की भरमार थी, वहाँ के बच्चे खुश रहना जानते थे। परंतु, उनके पास न तो अच्छे स्कूल थे, न ही खेल के मैदान। वे खुले खेतों में खेलते और पुराने कागज से बनाए गए खिलौनों से मस्ती करते। उनका एकमात्र स्कूल टूटी-फूटी छत और बेंचों वाला था। वहाँ के शिक्षक, रमेश सर, बच्चों को पढ़ाने में बहुत मेहनत करते थे। रमेश सर का सपना रमेश सर का सपना था कि उनके गाँव के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और बड़े होकर अपने सपनों को साकार करें। लेकिन गाँव में संसाधनों की कमी थी। बच्चों के पास किताबें तक पूरी नहीं होती थीं। फिर भी, बच्चे खुश थे। उनकी आँखों में सपने और दिल में उमंग थी।

माँ का प्यार (दिल को छू लेने वाली कहानी प्रेरणादायक कहानी )

दिल को छू लेने वाली कहानी:  माँ का प्यार      यह कहानी एक छोटे से गाँव में रहने वाले रमेश और उसकी माँ की है। रमेश की माँ का नाम सरस्वती था और वे बहुत ही मेहनती और समर्पित महिला थीं। रमेश के पिता का स्वर्गवास हो चुका था, जब वह बहुत छोटा था। सरस्वती ने अकेले ही रमेश को पाला और पढ़ाया-लिखाया। सरस्वती गाँव में छोटे-मोटे काम करके अपने बेटे को शिक्षा दिला रही थीं। वह चाहती थीं कि रमेश एक दिन बड़ा आदमी बने और अपने जीवन में सफल हो। रमेश भी अपनी माँ की मेहनत और त्याग को देखकर पढ़ाई में बहुत मन लगाता था। एक दिन रमेश की कॉलेज की फीस भरने के लिए सरस्वती के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने अपने गहने बेचकर रमेश की फीस भरी। रमेश को यह बात पता चली तो उसने मन ही मन ठान लिया कि वह बहुत मेहनत करेगा और अपनी माँ का सपना पूरा करेगा।

आखिरी खत ( प्रेरणादायक कहानी )

आखिरी खत         राहुल और सीमा बचपन से ही बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे और साथ में खेलते थे। समय बीतता गया और दोनों बड़े हो गए। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद राहुल को एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई और सीमा ने अपने पापा के कारोबार में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। राहुल अपनी नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता था। लेकिन हर साल दीवाली पर वह अपने घर आता था और अपने दोस्तों से मिलता था। इस बार दीवाली पर जब राहुल घर आया तो उसने सुना कि सीमा की तबीयत बहुत खराब है। उसे कैंसर हो गया था और उसकी हालत बहुत नाजुक थी।

मेहनत का फल ( रामू की प्रेरणादायक कहानी )

मेहनत का फल एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके पास बहुत ही कम जमीन थी और वह दिन-रात मेहनत करता था ताकि अपने परिवार का पेट भर सके। रामू के पास एक पुराना बैल था, जिसे वह बहुत प्यार करता था। वह बैल उसकी खेती का मुख्य साधन था। संघर्ष का आरंभ : एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें सूख गईं और किसान परेशान हो गए। रामू की स्थिति और भी खराब हो गई। उसका बैल भी बीमार पड़ गया। रामू ने अपनी सारी जमा पूंजी बैल के इलाज में लगा दी, लेकिन बैल ठीक नहीं हो सका और एक दिन वह मर गया।

अनमोल दोस्ती (दोस्ती और संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी )

"अनमोल दोस्ती" एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में दो बच्चे रहते थे, रोहित और सूरज। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे और हमेशा साथ में खेलते थे। उनका दोस्ती का बंधन इतना मजबूत था कि गाँव के लोग उनकी मिसाल देते थे। संघर्ष और संघर्ष का फल एक दिन गाँव में एक मेले का आयोजन हुआ। रोहित और सूरज भी मेले में गए। वहाँ उन्हें एक बड़ा पहाड़ी खेल देखने को मिला। जो भी इस पहाड़ी पर चढ़ाई करेगा और सबसे ऊपर पहुंचेगा, उसे इनाम मिलेगा। रोहित और सूरज ने भी इस खेल में हिस्सा लेने का निश्चय किया।

"जीवन की पाठशाला" ( एक शिक्षक की प्रेरणादायक कहानी )

एक शिक्षक की प्रेरणादायक कहानी "जीवन की पाठशाला"        छोटे से गांव में बसे एक स्कूल में, एक शिक्षक थे जिनका नाम श्री शास्त्री था। वह साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनकी शिक्षा देने की शैली और उनका दृष्टिकोण असाधारण था। शास्त्री जी का मानना था कि हर बच्चा अपने अंदर अद्भुत क्षमता लेकर आता है। उनका उद्देश्य केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अपने छात्रों को जीवन जीने की कला सिखाना चाहते थे। नया छात्र: अर्जुन       एक दिन, स्कूल में एक नया छात्र दाखिला लेने आया। उसका नाम अर्जुन था। अर्जुन का नाम तो महाकाव्यों के वीर योद्धा से प्रेरित था, लेकिन उसका स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। वह गुमसुम और आत्मविश्वासहीन रहता था। गांव में उसके परिवार को लेकर कई तरह की बातें होती थीं। उसके माता-पिता किसान थे, लेकिन गरीबी और कर्ज के कारण वह शिक्षा के प्रति अर्जुन को प्रेरित नहीं कर पाते थे।       अर्जुन अक्सर क्लास में पीछे की बेंच पर बैठा रहता और चुपचाप दीवार को घूरता रहता। उसकी किताबें धूल से ढकी रहतीं, और उसकी आंखों में एक अजीब-सी उदासी छाई रहती। कई शिक्षक ...

एक छोटी सी लड़की और उसका सपना ( सपने और संघर्ष )

एक छोटी सी लड़की और उसका सपना किसी गाँव में, नंदिनी नाम की एक दस वर्षीय लड़की रहती थी। वह बेहद मासूम और खुशमिजाज थी, लेकिन उसकी एक आँख कमजोर थी। उसकी इस कमजोरी के कारण गाँव के बच्चे उसे चिढ़ाते थे और "काना" कहकर बुलाते थे। नंदिनी यह सब सहती, लेकिन भीतर ही भीतर उसे बहुत दुःख होता। उसके पिता एक गरीब किसान थे। माँ घर संभालती थी, और नंदिनी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। परिवार के पास ज्यादा साधन नहीं थे, लेकिन नंदिनी के दिल में एक बड़ा सपना था। वह पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थी ताकि वह उन बच्चों की मदद कर सके, जिन्हें उसकी तरह कमजोरी या बीमारी के कारण ताने सहने पड़ते हैं। चुनौतियों का सामना नंदिनी का स्कूल गाँव के पास ही था। स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत साधारण था, और गाँव के बच्चे पढ़ाई से ज्यादा खेल-कूद में रुचि रखते थे। लेकिन नंदिनी अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर थी। उसे पता था कि डॉक्टर बनने के लिए मेहनत करनी होगी। हर दिन स्कूल से लौटने के बाद, वह अपने पिता के खेत में काम में हाथ बंटाती। माँ से खाना बनाना सीखती, और रात को दीये की हल्की रोशनी में किताबें पढ़ती। कई बार वह ...