एक छोटी सी लड़की और उसका सपना
किसी गाँव में, नंदिनी नाम की एक दस वर्षीय लड़की रहती थी। वह बेहद मासूम और खुशमिजाज थी, लेकिन उसकी एक आँख कमजोर थी। उसकी इस कमजोरी के कारण गाँव के बच्चे उसे चिढ़ाते थे और "काना" कहकर बुलाते थे। नंदिनी यह सब सहती, लेकिन भीतर ही भीतर उसे बहुत दुःख होता।
उसके पिता एक गरीब किसान थे। माँ घर संभालती थी, और नंदिनी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। परिवार के पास ज्यादा साधन नहीं थे, लेकिन नंदिनी के दिल में एक बड़ा सपना था। वह पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती थी ताकि वह उन बच्चों की मदद कर सके, जिन्हें उसकी तरह कमजोरी या बीमारी के कारण ताने सहने पड़ते हैं।
चुनौतियों का सामना
नंदिनी का स्कूल गाँव के पास ही था। स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत साधारण था, और गाँव के बच्चे पढ़ाई से ज्यादा खेल-कूद में रुचि रखते थे। लेकिन नंदिनी अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर थी। उसे पता था कि डॉक्टर बनने के लिए मेहनत करनी होगी।
हर दिन स्कूल से लौटने के बाद, वह अपने पिता के खेत में काम में हाथ बंटाती। माँ से खाना बनाना सीखती, और रात को दीये की हल्की रोशनी में किताबें पढ़ती। कई बार वह थक जाती, लेकिन उसके सपने उसे प्रेरित करते।
एक बड़ा अवसर
एक दिन गाँव में एक सरकारी अधिकारी आए। उन्होंने बताया कि सरकार होनहार बच्चों को शहर में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति देती है। लेकिन इसके लिए परीक्षा देनी होगी। यह सुनकर नंदिनी के मन में एक नई उम्मीद जागी।
वह परीक्षा के लिए दिन-रात मेहनत करने लगी। उसकी माँ ने अपनी बचत से उसे एक नई किताब दिलाई। पिता ने उसे यह कहकर प्रेरित किया, "तू बस दिल लगाकर मेहनत कर। हम तेरे सपने पूरे करने में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे।"
ताने और विश्वास
जब गाँव के बच्चों ने सुना कि नंदिनी शहर में पढ़ने जाना चाहती है, तो उन्होंने उसका मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा, "तू डॉक्टर बनेगी? पहले अपनी आँख तो ठीक करवा ले!"
नंदिनी को उनकी बातें चुभीं, लेकिन उसने खुद से वादा किया कि वह खुद को साबित करके दिखाएगी।
परीक्षा और परिणाम
परीक्षा का दिन आया। नंदिनी ने पूरी मेहनत से पेपर लिखा। परीक्षा के बाद वह बेसब्री से परिणाम का इंतजार करने लगी। कुछ हफ्तों बाद जब परिणाम घोषित हुए, तो नंदिनी का नाम चयनित विद्यार्थियों की सूची में था।
यह सुनकर उसके माता-पिता की आँखें खुशी से भर आईं। गाँव के कई लोग जो पहले उसका मजाक उड़ाते थे, अब उसे बधाई देने आए।
शहर का सफर
शहर में नंदिनी का सफर आसान नहीं था। उसे नई भाषा, नए लोग, और नई संस्कृति के साथ तालमेल बिठाना पड़ा। कई बार वह निराश हो जाती, लेकिन हर बार उसे अपने माता-पिता और अपने गाँव की याद आती।
नंदिनी ने अपनी पढ़ाई में पूरी लगन लगाई। वह दिन-रात मेहनत करती और अपने सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ती गई।
सपने का सच होना
सालों की मेहनत के बाद, नंदिनी ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ से डॉक्टर बनकर वह अपने गाँव लौटी। अब वह वही लड़की थी, जिसे कभी ताने सुनने पड़ते थे, लेकिन अब वही लोग उसे गर्व से देखते थे।
उसने गाँव में एक छोटा सा क्लिनिक खोला, जहाँ वह गरीबों का मुफ्त इलाज करती थी। उसने यह साबित कर दिया कि मेहनत और विश्वास से हर सपना सच हो सकता है।
कहानी की सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने सपनों और विश्वास पर डटे रहना चाहिए। दूसरों की नकारात्मकता से प्रभावित हुए बिना, यदि हम अपनी मेहनत और ईमानदारी से काम करें, तो सफलता अवश्य मिलती है।
"सपने देखने की हिम्मत करो, क्योंकि यही सपने तुम्हें असंभव को संभव करने की ताकत देते हैं।"
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