अंशु का परिवार गरीब था। उसके पिता किसान थे और मां घर पर सिलाई का काम करती थी। पढ़ाई के लिए अंशु को रोजाना 5 किलोमीटर चलकर स्कूल जाना पड़ता था। रास्ता कठिन था, लेकिन उसकी लगन उसे कभी पीछे हटने नहीं देती थी।
एक दिन स्कूल में मास्टर जी ने कक्षा में एक सवाल पूछा, "आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं?"
अंशु ने बिना झिझक कहा, "मैं वैज्ञानिक बनना चाहता हूं।"
सारी कक्षा ठहाका लगाकर हंस पड़ी। किसी ने कहा, "अरे, तुम तो खेत जोतने लायक भी नहीं हो। वैज्ञानिक कैसे बनोगे?" मास्टर जी ने भी उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
उस दिन अंशु का मन बहुत उदास था। वह घर लौटते वक्त बार-बार सोचता रहा, "क्या मैं सच में कुछ नहीं कर सकता? क्या मेरी गरीबी मेरे सपनों का अंत है?"
मां की प्रेरणा
शाम को जब अंशु घर पहुंचा, तो उसकी मां ने उसके चेहरे पर उदासी देखी। उसने प्यार से पूछा, "क्या हुआ बेटा?"
अंशु ने सारी बात बताई। उसकी मां मुस्कुराई और कहा, "बेटा, लोग क्या कहते हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता। अगर तुम्हारा दिल और मेहनत सही है, तो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।"
उस रात अंशु ने ठान लिया कि वह अपने सपने के लिए हर मुश्किल से लड़ेगा।
संकट और संघर्ष
अंशु के पास पढ़ाई के लिए साधन नहीं थे। उसके गांव में बिजली नहीं थी, तो वह रात में मिट्टी के दीये की रोशनी में पढ़ाई करता। किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, तो वह पुराने अखबारों और स्कूल की लाइब्रेरी से ज्ञान जुटाता।
वह हर दिन सूरज उगने से पहले उठता, खेतों में अपने पिता की मदद करता, फिर स्कूल जाता। स्कूल से लौटकर वह अपनी मां के साथ सिलाई में हाथ बंटाता, और फिर पढ़ाई करता।
एक दिन गांव में एक बड़ा मेला लगा। मेले में एक बूढ़े दादाजी ने एक कहानी सुनाई। कहानी थी, "चील और उसके घोंसले की।"
दादाजी ने बताया कि कैसे चील अपने बच्चों को उड़ने के लिए ऊंचाई से धकेल देती है। बच्चे गिरने से डरते हैं, लेकिन जैसे ही वे अपने पंखों को खोलते हैं, वे उड़ने लगते हैं।
इस कहानी ने अंशु को गहराई से प्रभावित किया। उसने महसूस किया कि अगर वह अपने डर और परेशानियों का सामना करेगा, तो वह भी अपने जीवन में उड़ान भर सकेगा।
पहला कदम
अंशु ने मेहनत जारी रखी। उसने स्कूल की परीक्षा में टॉप किया और जिला स्तर पर एक स्कॉलरशिप जीती। उस स्कॉलरशिप ने उसकी पढ़ाई को नया मोड़ दिया। अब उसे गांव से शहर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।
शहर आना उसके लिए आसान नहीं था। वहां के बच्चों की बड़ी-बड़ी बातें और उनका जीवनशैली देखकर अंशु को शुरुआत में घबराहट हुई। लेकिन उसने ठान लिया कि वह अपनी मेहनत और सादगी से अपनी जगह बनाएगा।
चुनौतियों का सामना
एक दिन, स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। अंशु ने अपनी मेहनत से एक सिंचाई यंत्र बनाया, जो कम पानी में भी खेतों की सिंचाई कर सकता था। वह यंत्र गांव की समस्याओं से प्रेरित था।
जब उसने यंत्र प्रदर्शनी में दिखाया, तो लोग हैरान रह गए। कई लोगों ने कहा, "यह लड़का जरूर कुछ बड़ा करेगा।"
अंशु का यह यंत्र राज्य स्तर पर भी चुना गया और उसे पुरस्कार मिला।
सपनों की ओर उड़ान
धीरे-धीरे अंशु ने अपनी मेहनत और लगन से अपनी पहचान बनाई। उसने स्कॉलरशिप की मदद से इंजीनियरिंग में दाखिला लिया और वहां भी टॉप किया। पढ़ाई खत्म होने के बाद उसे वैज्ञानिक के तौर पर एक प्रतिष्ठित संस्थान में काम करने का मौका मिला।
कुछ साल बाद, अंशु ने अपने गांव लौटकर वहां के किसानों की मदद के लिए नई तकनीकों की शुरुआत की। अब वह गांव का हीरो बन चुका था। जिसने कभी उसे ताना मारा था, वही लोग अब उसकी प्रशंसा करते थे।
सबक
अंशु की कहानी सिखाती है कि "जिंदगी में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, अगर आप ऊपर उठने की ठान लें, तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती।"
अंशु ने यह साबित कर दिया कि सपने देखने का अधिकार हर किसी का है, और उन्हें पूरा करने की ताकत हमारी मेहनत और विश्वास में है।
"ऊपर उठो, क्योंकि सपने देखने वाले ही असली विजेता होते हैं।"
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