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प्रेरणा की ज्योत : "शिक्षक का अद्वितीय उपहार"

"शिक्षक का अद्वितीय उपहार"

एक छोटे से गांव में, जहां तक बिजली के तार भी नहीं पहुंचे थे, वहां के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक रहते थे, जिनका नाम रामशरण था। रामशरण जी के पास बहुत अधिक साधन नहीं थे, लेकिन उनके पास बच्चों को सिखाने का जुनून और उनकी जिंदगी बदलने की चाहत जरूर थी। उनके लिए शिक्षा केवल अक्षरों और अंकों तक सीमित नहीं थी; वह इसे जीवन को बेहतर बनाने का साधन मानते थे।

गांव का सबसे कमजोर छात्र

रामशरण जी के स्कूल में एक बच्चा था, जिसका नाम मोहन था। मोहन पढ़ाई में बहुत कमजोर था। वह अक्सर पाठ याद करने में असफल रहता और बाकी बच्चों के बीच मजाक का पात्र बन जाता। उसकी स्थिति ऐसी थी कि हर शिक्षक उसे अपने सिर का दर्द मानता।

मोहन के माता-पिता किसान थे, और वह स्कूल के बाद खेतों में उनकी मदद करता था। दिनभर की थकान के बाद वह पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाता था। उसकी आत्मविश्वासहीनता इतनी बढ़ गई थी कि उसने खुद को नाकाम मान लिया था।

रामशरण जी की दृष्टि

एक दिन, जब रामशरण जी ने मोहन को क्लास में चुपचाप बैठा देखा, तो उन्होंने उससे पूछा, “मोहन, तुम इतने उदास क्यों हो?”

मोहन ने धीरे से कहा, “मुझे लगता है कि मैं किसी काम का नहीं हूं। मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं हूं, और शायद स्कूल मेरे लिए नहीं है।”


रामशरण जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हर बच्चा खास होता है, मोहन। तुम्हारे अंदर भी कोई विशेषता है, बस हमें उसे ढूंढना है। क्या तुम तैयार हो?”

मोहन ने सिर हिलाकर सहमति दी, हालांकि वह खुद को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं था।

शिक्षा के नए तरीके

अगले दिन से, रामशरण जी ने मोहन के साथ अलग तरीके से काम करना शुरू किया। उन्होंने देखा कि मोहन के हाथ बहुत सधे हुए थे, और वह मिट्टी से खिलौने और छोटे-छोटे मॉडल बनाता था। यह उसकी रचनात्मकता का प्रमाण था।

रामशरण जी ने मोहन से कहा, “तुम्हारे हाथों में जादू है। चलो, इस जादू को पढ़ाई में इस्तेमाल करते हैं।”

उन्होंने मोहन को हर विषय को उसकी कला के जरिए समझाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, गणित के सवालों को हल करने के लिए मिट्टी के खिलौनों का उपयोग किया और विज्ञान के प्रयोगों को मिट्टी के मॉडल्स में बदल दिया। धीरे-धीरे, मोहन का पढ़ाई में रुचि बढ़ने लगी।

पहली परीक्षा का परिणाम

जब अगली परीक्षा हुई, तो मोहन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। हालांकि वह टॉप नहीं कर पाया, लेकिन उसके नंबरों में सुधार देखकर सभी हैरान थे। रामशरण जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, “यह तो सिर्फ शुरुआत है। तुम्हें और मेहनत करनी है।”

इस प्रशंसा ने मोहन के आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी। वह अब क्लास में सवाल पूछने लगा और अपने दोस्तों को भी प्रेरित करने लगा।

बदलाव की कहानी

एक दिन, स्कूल में हस्तकला प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। मोहन ने अपने हाथों से मिट्टी का एक गांव बनाया, जिसमें खेत, नदी, घर, और पेड़ बहुत ही सुंदरता से दर्शाए गए थे। उसकी कला इतनी अनोखी थी कि वह प्रतियोगिता में पहला स्थान जीत गया।

इस जीत ने न केवल मोहन को, बल्कि उसके माता-पिता को भी गर्व महसूस कराया। यह उस बच्चे की कहानी बन गई जिसे कभी "नालायक" समझा जाता था।

समर्पण और मेहनत का फल

मोहन अब पढ़ाई और कला दोनों में अव्वल हो गया था। उसकी मेहनत रंग लाई, और उसने बोर्ड परीक्षा में टॉप किया। गांव के लोग, जो कभी उसे हंसते थे, अब उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।

मोहन ने आगे की पढ़ाई के लिए शहर का रुख किया। वहां उसने अपनी कला और पढ़ाई दोनों में बेहतरीन प्रदर्शन किया। कुछ वर्षों बाद, वह एक प्रसिद्ध आर्किटेक्ट बन गया, जिसने अपनी रचनात्मकता और मेहनत के बल पर नाम कमाया।

गुरु का आभार

मोहन ने अपनी सफलता का श्रेय हमेशा रामशरण जी को दिया। वह अपने गांव लौटकर उनके पैर छूने गया और कहा, “गुरुजी, आपने मुझे खुद पर विश्वास करना सिखाया। अगर आप मेरी क्षमता न पहचानते, तो मैं आज भी वहीं खड़ा होता, जहां पहले था।”

रामशरण जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “एक शिक्षक का काम सिर्फ सिखाना नहीं, बल्कि अपने छात्रों को उनके भीतर छिपे हीरे को तराशने में मदद करना है। तुमने अपनी मेहनत और लगन से खुद को साबित किया है। मैं सिर्फ एक ज्योत था, रोशनी तुमने खुद फैलाई।”

सीख: 

यह कहानी हमें सिखाती है कि हर बच्चा विशेष होता है। जरूरत है तो बस उसकी क्षमताओं को पहचानने और उसे सही दिशा में प्रोत्साहित करने की। एक सच्चा शिक्षक वही है, जो छात्रों को केवल किताबें पढ़ाने के बजाय उन्हें जीवन के हर पहलू में बेहतर बनने के लिए प्रेरित करे।

शिक्षक दिवस पर, उन सभी गुरुओं को नमन करें, जो हमारी जिंदगी को संवारने और हमें बेहतर इंसान बनाने में अपना योगदान देते हैं।

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